

लोक नायक संवाद नेटवर्क
मोगा-पंजाब की सियासत में ‘मोगा’ हमेशा से एक निर्णायक केंद्र रहा है, लेकिन हाल ही में हुए एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम ने यहाँ के तमाम पुराने समीकरणों को मटियामेट कर दिया है। मोगा के जनप्रिय नेता, प्रखर वक्ता और मजदूरों के हक की आवाज बुलंद करने वाले विजय धीर एडवोकेट के शिरोमणि अकाली दल (बादल) में शामिल होने से विधानसभा क्षेत्र में एक नई लहर पैदा हो गई है।
अकाली दल, जिसे मोगा में एक कद्दावर और सर्वमान्य हिंदू चेहरे की तलाश थी, विजय धीर के रूप में वह तलाश अब पूरी होती दिख रही है। उनके साथ 55 मजदूर जत्थेबंदियों के समर्थन ने शिरोमणि अकाली दल को वह जमीनी मजबूती दी है, जिसकी कल्पना विपक्षी दल भी नहीं कर पा रहे थे।
सुखबीर बादल की मौजूदगी में हुआ शक्ति प्रदर्शन
गत दिनों जब विजय धीर एडवोकेट ने शिरोमणि अकाली दल के सुप्रीमो सुखबीर सिंह बादल की उपस्थिति में पार्टी का दामन थामा, तो यह महज एक जॉइनिंग नहीं बल्कि एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन था। उनके साथ सैकड़ों समर्थकों और मजदूर प्रतिनिधियों का काफिला देख सियासी गलियारों में यह चर्चा आम हो गई है कि अब मोगा में अकाली दल को रोकना आसान नहीं होगा। जहाँ उनके शुभचिंतकों में जश्न का माहौल है, वहीं विपक्षी खेमों में इस “मास्टरस्ट्रोक” के बाद बेचैनी साफ देखी जा सकती है।
बहुआयामी व्यक्तित्व: कानून के जानकार से ‘आवाज-ए-मोगा’ तक
विजय धीर केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक संस्था हैं। एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में उनकी साख और एक ईमानदार छवि ने उन्हें जनता के बीच अटूट विश्वास दिलाया है।
मजदूरों के मसीहा: क्षेत्र का श्रमिक वर्ग उन्हें अपना रक्षक मानता है।
मोगा का विजन: वर्ष 2005 में ‘मोगा सिटी ब्यूटीफिकेशन मास्टर प्लान’ तैयार कर उन्होंने साबित किया था कि उनके पास शहर के विकास का स्पष्ट रोडमैप है। इसी दूरदर्शिता के कारण उन्हें ‘आवाज-ए-मोगा’ के सम्मान से नवाजा गया था।
सामाजिक नेतृत्व: खत्री बिरादरी के रत्न के रूप में उन्होंने 14 वर्षों तक ‘खत्री सभा मोगा’ की कमान संभाली और भव्य ‘खत्री भवन’ का निर्माण करवाया। वर्तमान में वह ‘खत्री महा सभा पंजाब’ के संस्थापक प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पूरे राज्य के खत्री समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
एक लंबा और गौरवशाली राजनीतिक सफर
विजय धीर का राजनीतिक अनुभव दशकों पुराना है, जो जयप्रकाश नारायण (JP) के आंदोलन की तपिश से शुरू हुआ था:
जमीनी शुरुआत: 1977 से पहले जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका।
जनता पार्टी व भाजपा: राजनीति की शुरुआती पारी जनता पार्टी से की और बाद में भाजपा में फरीदकोट जिले के BJYM अध्यक्ष रहे।
कांग्रेस का लंबा अध्याय: 1985 में महान नेता सरदार गुरचरण सिंह निहाल सिंह वाला के सानिध्य में कांग्रेस में आए और करीब 25 वर्षों तक मजदूर शाखा के जिला प्रधान के रूप में सेवा की।
वैचारिक स्थिरता की तलाश: कांग्रेस में उपेक्षा के बाद कुछ समय के लिए भारतीय मजदूर संघ से जुड़े, लेकिन अंततः अपनी स्वतंत्र और जनहितैषी विचारधारा के कारण वहां से भी दूरी बना ली।
अकाली दल के लिए ‘तुरुप का इक्का’
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विजय धीर को पार्टी में लाने का पूरा श्रेय हलका इंचार्ज संजीत सिंह सन्नी गिल को जाता है। सन्नी गिल की इस रणनीतिक सूझबूझ ने अकाली दल को मोगा में फ्रंटफुट पर ला खड़ा किया है।
धीर के आने से न केवल हिंदू वोट बैंक में सेंध लगेगी, बल्कि 55 मजदूर जत्थेबंदियों का साथ मिलने से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अकाली दल का कैडर मजबूत होगा। बुद्धिजीवियों का कहना है कि विजय धीर जैसे “दिलों के विजेता” का साथ मिलना अकाली दल के लिए इस समय सबसे बड़ी संजीवनी है। मोगा की जनता अब विजय धीर एडवोकेट को एक नए विकल्प के रूप में देख रही है। उनके अनुभव, ईमानदारी और संघर्षशील स्वभाव का लाभ निश्चित रूप से शिरोमणि अकाली दल को आगामी चुनावों में मिलेगा। अब देखना यह होगा कि अन्य पार्टियां इस बड़े झटके से उबरने के लिए क्या रणनीति अपनाती हैं।
















