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शिक्षित बेरोजगारी और बढ़ती लूटपाट: एक राष्ट्रीय संकट

आज भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ हर राज्य में कुछ न कुछ गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश या फिर महाराष्ट्र—हर जगह एक जैसी ही तस्वीर बनती जा रही है। बेरोजगारी, नशे, लूटपाट, हत्याएँ, और सामाजिक असंतुलन अब सामान्य खबरें बन चुकी हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि इन घटनाओं के पीछे एक गहरा और खतरनाक कारण छिपा हुआ है—शिक्षित बेरोजगारी।आज हमारे देश के लाखों नौजवान ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, इंजीनियर, एमबीए, पीएचडी तक की पढ़ाई कर चुके हैं। लेकिन इन डिग्रियों के बाद भी उन्हें न तो उनके लायक नौकरी मिलती है, न सम्मान। मजबूरी में वे छोटी-मोटी नौकरियाँ करते हैं या फिर पूरी तरह हताश होकर घर बैठ जाते हैं। जब पढ़ा-लिखा युवा बार-बार दरवाज़ों से लौटाया जाता है, तो वह अंदर से टूटने लगता है।बेरोजगारी सिर्फ आर्थिक संकट नहीं है, यह एक मानसिक युद्ध है। और यही मानसिक तनाव कई बार लूटपाट, ठगी, हिंसा और नशे की लत में बदल जाता है। आजकल बड़ी संख्या में युवा आपराधिक गतिविधियों में सिर्फ इसलिए शामिल हो रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा है। अपराध अब सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि एक विकल्प बनता जा रहा है।यह समस्या सिर्फ पंजाब की नहीं है। बिहार के युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के इंतज़ार में सालों-साल बर्बाद कर देते हैं। राजस्थान में शिक्षक भर्ती के नाम पर सालों तक राजनीति होती है। उत्तर प्रदेश में पुलिस या आर्मी भर्ती के लिए लाखों युवा पसीना बहाते हैं, लेकिन चयन बेहद सीमित होता है। महाराष्ट्र, झारखंड, बंगाल—हर राज्य में यही कहानी है। हर जगह नौजवानों की भीड़ है, लेकिन रोजगार के नाम पर खाली हाथ।जहाँ नौकरी नहीं मिलती, वहाँ खाली समय और हताशा मिलती है। और यही खाली समय अपराधियों, कट्टरपंथियों और नशा बेचने वालों के लिए सबसे उपजाऊ ज़मीन बन जाती है। खासतौर से पंजाब जैसे राज्यों में जहां नशे की समस्या पहले से ही बड़ी है, वहां बेरोजगारी ने इसे और बढ़ावा दिया है। युवा जो कुछ करना चाहता था, वो कुछ और कर बैठता है — और एक बार रास्ता बिगड़ा, तो फिर वापसी मुश्किल होती है ।‌ हर सरकार चुनावों से पहले युवाओं को लाखों नौकरियों का वादा करती है। लेकिन चुनाव जीतते ही सब वादे कागज़ों में दब जाते हैं। रोजगार मेले, स्टार्टअप योजनाएं, स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों की असल हालत ज़मीनी स्तर पर बहुत कमजोर है। निजी कंपनियों को राज्य में लाने का वादा हर साल होता है, लेकिन उद्योग या तो आते नहीं, या कुछ वर्षों में ही बंद हो जाते हैं।जो नौकरियाँ निकलती भी हैं, उनमें पारदर्शिता का अभाव होता है। रिश्वत, सिफारिश और जातिवाद जैसे तत्व योग्यता को पीछे छोड़ देते हैं। एक गरीब घर का होनहार बच्चा सिर्फ इसलिए चयनित नहीं हो पाता क्योंकि उसके पास कोई सिफारिश नहीं है। ये अन्याय उसकी आत्मा को कुचल देता है।जब युवा हताश होता है, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। पारिवारिक तनाव बढ़ता है, माता-पिता मानसिक रूप से टूटते हैं, और समाज में असुरक्षा का भाव फैलने लगता है। लूटपाट, चेन स्नैचिंग, सड़कों पर झगड़े, या खुलेआम गोलीबारी जैसी घटनाएं सिर्फ अपराध नहीं हैं, ये हमारे तंत्र की असफलता की गवाही हैं।सबसे पहले तो केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर गंभीरता से इस संकट पर काम करना होगा। शिक्षा को उद्योगों से जोड़ा जाना चाहिए ताकि डिग्रियों के साथ रोजगार के अवसर भी खड़े हों। हर जिले में एक ऐसा केंद्र बनना चाहिए जो युवाओं को ट्रेनिंग, मार्गदर्शन और नौकरी की दिशा दे।

दूसरा, पारदर्शी भर्ती प्रणाली हो, जिसमें भ्रष्टाचार की कोई जगह न हो। अगर कोई अधिकारी या नेता इसमें गड़बड़ी करता है, तो उसके खिलाफ सख्त सजा हो।

तीसरा, युवा स्वयं भी आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ाएं। सिर्फ सरकारी नौकरी के भरोसे न रहें। छोटे व्यापार, डिजिटल काम, फ्रीलांसिंग, खेती या तकनीकी स्किल्स के जरिए खुद के लिए रास्ते बनाएं। सरकार को चाहिए कि वो इन रास्तों को आसान बनाए और आर्थिक मदद दे।सिर्फ सरकार से ही उम्मीद करना सही नहीं होगा। समाज को भी युवाओं की स्थिति समझनी होगी। धार्मिक और समाजिक संगठन, क्लब, एनजीओ अगर मिलकर बेरोजगार युवाओं को ट्रेनिंग देने, उन्हें मानसिक रूप से मजबूत करने और उन्हें सही दिशा देने में लगे, तो बहुत कुछ बदल सकता है।आज का शिक्षित युवा हमारी सबसे बड़ी ताकत हो सकता है — अगर उसे सही अवसर मिले। लेकिन अगर हमने अभी भी इसे नजरअंदाज किया, तो यही युवा समाज के लिए सबसे बड़ा संकट बन जाएगा। इसलिए ज़रूरत है कि हम सिर्फ भाषणों और वादों से आगे बढ़ें, और ज़मीनी काम करें। वरना आने वाला कल और भी डरावना हो सकता है।

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