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इलेक्ट्रो होमियोपैथी: एक उपेक्षित लेकिन प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति – मान्यता की राह में चुनौतियाँ और संभावनाएँ

भारत विविधताओं का देश है, जहां चिकित्सा के कई मार्गों को अपनाया गया – एलोपैथी, आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, होमियोपैथी और प्राकृतिक चिकित्सा। लेकिन एक पद्धति ऐसी भी है, जिसे लाभकारी परिणामों और सुरक्षित उपचार होने के बावजूद अब तक व्यापक मान्यता नहीं मिल पाई — और वह है इलेक्ट्रो होमियोपैथी (Electro Homoeopathy)।

यह चिकित्सा पद्धति आज देश के कई हिस्सों में शांति से लोगों का इलाज कर रही है, सैकड़ों क्लीनिक और अस्पताल कार्यरत हैं, हजारों चिकित्सक इससे जुड़े हैं, फिर भी इसे सरकारी मान्यता और संरक्षण से वंचित रखा गया है।

इलेक्ट्रो होमियोपैथी की खोज 19वीं सदी में इटली के डॉ. काउंट सेजुरी मैटी (Count Cesare Mattei) ने की थी। इस पद्धति की नींव उन्होंने पौधों के “ऊर्जा तत्वों” (electricity of plants) पर आधारित उपचार पर रखी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि पौधों से प्राप्त सक्रिय तत्वों को वैज्ञानिक विधियों से निकालकर रोग के मूल कारण को नष्ट किया जा सकता है।

इस पद्धति में कोई साइड इफेक्ट नहीं होता, क्योंकि इसमें प्रयोग की जाने वाली औषधियाँ पूर्णतः प्राकृतिक, गैर विषैली, रासायनिक मुक्त और जैविक होती हैं।

इलेक्ट्रो होमियोपैथी एक प्लांट-एनर्जी आधारित चिकित्सा पद्धति है, जिसमें रोग के लक्षण नहीं, बल्कि उसके मूल कारण (root cause) का इलाज किया जाता है। इसमें रक्त (Blood) और लसीका (Lymphatic) प्रणाली की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

इस पद्धति का यह भी मानना है कि यदि रक्त और लसीका शुद्ध हैं, तो कोई भी रोग शरीर में नहीं टिक सकता।

रोगी के संपूर्ण शरीर और प्रणाली की जांच की जाती है।
औषधियाँ आमतौर पर 59 मूल संयोजनों से तैयार की जाती हैं।
सभी दवाइयाँ वेजिटेबल बेस्ड होती हैं।
दवा की खुराक कम, असर तीव्र।
कोई सर्जरी, इंजेक्शन, स्टेरॉयड या एंटीबायोटिक नहीं।

पूर्णतः सुरक्षित – कोई साइड इफेक्ट नहीं।
सस्ती दवाइयाँ – गरीब मरीजों के लिए उपयोगी।
सर्जरी से बचाव – कई जटिल रोग बिना ऑपरेशन ठीक किए जा सकते हैं।
रोग का मूल कारण समाप्त करती है।
बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए सुरक्षित।

भारत में पिछले कुछ दशकों से इलेक्ट्रो होमियोपैथी का धीरे-धीरे प्रसार हुआ है। देश के कई राज्यों में यह पद्धति गैर-आधिकारिक रूप से स्वीकृत है, यानी सीधे सरकार ने मान्यता नहीं दी लेकिन इसके क्लीनिक/कॉलेज/रिसर्च सेंटर सक्रिय हैं।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में दर्जनों कॉलेज और अस्पताल पंजीकृत हैं।

भारत सरकार ने इलेक्ट्रो होमियोपैथी की दवाओं के निर्माण हेतु कई फर्मों को लाइसेंस दिया है, जो यह साबित करता है कि सरकार आंशिक रूप से इस पद्धति को वैध मानती है।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2010 में यह स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित मेडिकल पद्धतियों का अभ्यास कर सकता है, यदि वह संस्थान पंजीकृत है और किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से प्रशिक्षण प्राप्त है।

यह निर्णय इलेक्ट्रो होमियोपैथी के चिकित्सकों के लिए एक कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन दुर्भाग्यवश राज्यों की नीतियाँ अब भी अस्पष्ट हैं।

सरकारी उदासीनता: इलेक्ट्रो होमियोपैथी को अब तक मेडिकल काउंसिल एक्ट के तहत औपचारिक मान्यता नहीं मिली है।
दूसरी पद्धतियों से विरोध: कई बार एलोपैथिक लॉबी इसे चुनौती देती है।
जनता में जागरूकता की कमी।
मेडिकल बोर्ड का अभाव।

चिकित्सा पद्धति के मानकीकरण के लिए।
क्वालिटी कंट्रोल और निगरानी के लिए।
फर्जी संस्थानों पर रोक लगाने के लिए।
छात्रों और चिकित्सकों के लिए प्रमाणिक डिग्री और लाइसेंस की व्यवस्था।

लोग एलोपैथी और अन्य महंगी चिकित्सा पद्धतियों से परेशान होकर अब इलेक्ट्रो होमियोपैथी की ओर मुड़ रहे हैं।

📌 डायबिटीज, गठिया, त्वचा रोग, अस्थमा, पीसीओडी, माइग्रेन आदि में इसके प्रभावी परिणाम सामने आए हैं।

इटली, जर्मनी, फ्रांस और पाकिस्तान जैसे देशों में इलेक्ट्रो होमियोपैथी के रिसर्च इंस्टीट्यूट कार्यरत हैं।
कई देशों में यह पद्धति “ऑल्टर्नेटिव मेडिसिन” के रूप में मान्य है।

सरकार को राष्ट्रीय इलेक्ट्रो होमियोपैथी आयोग का गठन करना चाहिए।
इलेक्ट्रो होमियोपैथी को AYUSH की तरह एक अलग पहचान दी जाए।
हर राज्य में इसके लिए अलग बोर्ड या सेल बनाया जाए।
मेडिकल विद्यार्थियों को सही पाठ्यक्रम और परीक्षा प्रणाली दी जाए।
मान्यता प्राप्त संस्थानों को सरकार प्रोत्साहन दे।

इलेक्ट्रो होमियोपैथी एक ऐसी पद्धति है जो सस्ती, सुरक्षित, सरल और असरदार है। इस पद्धति की उपेक्षा केवल राजनीतिक या नीतिगत कारणों से हो रही है, न कि वैज्ञानिक आधार पर। जब सुप्रीम कोर्ट इसका वैधानिक आधार दे चुका है, जब देशभर में इसके संस्थान, चिकित्सक और मरीज संतुष्ट हैं — तब इसे उचित पहचान क्यों नहीं?

अब वक्त आ गया है कि भारत सरकार और राज्य सरकारें इस ओर गंभीरता से ध्यान दें और इस वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति को सम्मान, समर्थन और संरचना प्रदान करें।

“जब तक चिकित्सा को व्यापार के बजाय सेवा माना जाएगा, तब तक समाज स्वस्थ रहेगा। इलेक्ट्रो होमियोपैथी इस सेवा भाव की मिसाल है।”

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