
जब भी हम समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्वों की चर्चा करते हैं, तो कुछ नाम ऐसे होते हैं जो वर्षों की सेवा, संघर्ष और सादगी से खुद को इतिहास के पन्नों में दर्ज कर लेते हैं। ऐसे ही एक नाम हैं – डॉ. चमनलाल सचदेवा, जो लाला लाजपत राय पॉलिटेक्निक कॉलेज, अजीतवाल के निदेशक (Director) के रूप में आज भी सक्रिय रूप से सेवा कार्यों में लगे हुए हैं।
उनका जीवन समाज सेवा, शिक्षा के प्रसार और युवाओं को दिशा देने में बीता है। वे न केवल एक सफल प्रशासक और शिक्षाविद हैं, बल्कि एक प्रेरणा स्रोत भी हैं, जिन्हें शैक्षणिक संस्थाएँ, समाजसेवी संगठन, और आम नागरिक भी अपने मार्गदर्शक के रूप में मानते हैं।
डॉ. चमनलाल सचदेवा का जन्म एक साधारण, लेकिन सुसंस्कारित परिवार में हुआ। बचपन से ही उनमें पढ़ाई, अनुशासन और समाज के प्रति सेवा भाव स्पष्ट रूप से झलकता था। उन्होंने अपनी शिक्षा अत्यंत कठिनाइयों के बीच पूरी की। सीमित संसाधनों में भी उन्होंने जो संकल्प और परिश्रम दिखाया, वह उनके जीवन की दिशा तय करने वाला रहा।
उन्होंने फार्मेसी क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त की और सरकारी सेवा में प्रवेश किया, जहाँ उन्होंने सिविल अस्पताल में चीफ फार्मासिस्ट के रूप में वर्षों तक कार्य किया। इस दौरान उन्होंने न केवल स्वास्थ्य सेवा को जन-जन तक पहुँचाया, बल्कि समाज के उपेक्षित वर्गों की विशेष रूप से सेवा की।
सेवानिवृत्ति के बाद जहाँ अधिकतर लोग विश्राम को प्राथमिकता देते हैं, वहीं डॉ. चमनलाल सचदेवा ने जीवन के इस चरण को समाज सेवा का स्वर्णिम अवसर माना। उन्होंने लाला लाजपत राय पॉलिटेक्निक कॉलेज, अजीतवाल की कमान संभाली, जो पहले साधारण स्थिति में था।
उनके आने के बाद कॉलेज में न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार हुआ, बल्कि आधारभूत ढाँचे, स्टाफ प्रशिक्षण, छात्र अनुशासन और प्लेसमेंट गतिविधियों में भी क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिले। उन्होंने कॉलेज को एक मिशन के रूप में लिया और इसे युवाओं के निर्माण का केंद्र बना दिया।
आज जब भी कोई व्यक्ति डॉ. चमनलाल से मिलता है, तो वह उन्हें केवल एक शिक्षक या प्रशासक नहीं बल्कि “चलता-फिरता विश्वविद्यालय” कहता है। उनके पास शिक्षा, चिकित्सा, प्रशासन, समाज सेवा, धार्मिक मूल्य और प्रबंधन का इतना गहरा अनुभव है कि उनसे कुछ ही क्षणों की बातचीत में व्यक्ति कई जीवन सूत्र सीख जाता है।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अनुभव केवल आयु का नहीं, सेवा और समर्पण का नाम होता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आज क्षेत्र की सभी सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाएँ डॉ. चमनलाल को अपना प्रेरणास्त्रोत मानती हैं। उनके विचारों, नेतृत्व क्षमता और कार्यशैली को न केवल सराहा जाता है, बल्कि संस्थाओं द्वारा अपनाया भी जाता है।
कई धार्मिक आयोजन हों, समाज कल्याण कार्यक्रम, विद्यालयों के सेमिनार, या स्वास्थ्य शिविर — सबमें उनकी सक्रिय उपस्थिति, मार्गदर्शन और समर्थन रहता है। वे जहाँ जाते हैं, वहाँ एक विश्वास की भावना भी साथ जाती है।
डॉ. सचदेवा का जीवन एक सादगी का आदर्श है। वे दिखावे से कोसों दूर हैं। उनका पहनावा, खानपान, रहन-सहन — सभी में सादगी, लेकिन गंभीरता है। वे मानते हैं कि व्यक्ति की पहचान उसके कार्य से होती है, ना कि बाहरी आडंबर से।
उनकी दिनचर्या आज भी अनुशासित है। वे नियमित कॉलेज जाते हैं, समय पर बैठकों में भाग लेते हैं, शिक्षकों और छात्रों से संवाद करते हैं और हर कार्य को निष्ठा से करते हैं। उनका जीवन एक उदाहरण है कि सेवा और अनुशासन की कोई उम्र नहीं होती।
डॉ. चमनलाल सचदेवा न केवल कॉलेज के निदेशक हैं, बल्कि हर छात्र के लिए एक संरक्षक, मार्गदर्शक और प्रेरक भी हैं। वे विद्यार्थियों से निरंतर संवाद रखते हैं, उनकी समस्याओं को सुनते हैं, उन्हें सलाह देते हैं और जरूरत पड़े तो उनके परिवारजनों से भी संपर्क करते हैं।
उनके कई शिष्य आज देश-विदेश की प्रतिष्ठित कंपनियों और संस्थानों में कार्यरत हैं। वे जब भी कॉलेज लौटते हैं, तो सबसे पहले डॉ. सचदेवा से मिलकर उन्हें धन्यवाद कहना नहीं भूलते। यह उनके व्यक्तित्व की वह अमिट छवि है, जो पीढ़ियों तक याद रखी जाएगी।
डॉ. चमनलाल जी के परिवार में भी उनके संस्कार स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। उनके सभी बच्चे पढ़े-लिखे, डॉक्टर और समाजसेवी हैं। उन्होंने अपने जीवन में जो मूल्यों की बुनियाद रखी, वही आज उनके बच्चों के जीवन में भी दिखती है।
उनका मानना है कि “बच्चों को केवल शिक्षा नहीं, संस्कार भी देना जरूरी है।” वे यह सिखाते हैं कि हर सफलता का आधार ईमानदारी, परिश्रम और सेवा भावना ही होना चाहिए।
डॉ. चमनलाल समाज के हर वर्ग के लिए कार्यरत हैं — चाहे वह गरीब हो, बुजुर्ग, युवा या महिला। उन्होंने शिक्षा शिविर, स्वास्थ्य जागरूकता अभियान, नशा मुक्ति अभियान, जल संरक्षण कार्यक्रम, और ग्रामीण विकास से जुड़े अनेक कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई है।
वे युवाओं को व्यसन मुक्त रहने, अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने और तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनने का संदेश देते हैं।
डॉ. चमनलाल सचदेवा को कई संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है, लेकिन वे कभी इन सम्मानों का प्रदर्शन नहीं करते। उनका कहना है —
“सबसे बड़ा पुरस्कार है किसी छात्र की सफलता, किसी संस्था की प्रगति, और किसी जरूरतमंद के चेहरे पर आई मुस्कान।”
आज जब संस्थाओं को योग्य नेतृत्व की आवश्यकता है, डॉ. चमनलाल जी जैसा नेतृत्व दुर्लभ होता जा रहा है। वे न केवल काम को दिशा देते हैं, बल्कि हर व्यक्ति को साथ लेकर चलते हैं। उनका नेतृत्व लोकतांत्रिक, दूरदर्शी और निष्पक्ष होता है।
उनकी योजना हमेशा समावेशी होती है — जिसमें शिक्षक, छात्र, कर्मचारी, प्रबंधक सभी की भूमिका होती है। यही कारण है कि जहाँ वे होते हैं, वहाँ काम में समर्पण, समन्वय और संतुलन स्वतः उत्पन्न हो जाता है।
डॉ. चमनलाल सचदेवा का युवाओं को स्पष्ट संदेश है:
“केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, समाज बदलने के लिए पढ़ो। ज्ञान अर्जन का लक्ष्य केवल निजी लाभ नहीं, सामूहिक उत्थान होना चाहिए।”
वे यह भी कहते हैं कि हर युवा को आत्मनिर्भर बनना चाहिए, तकनीक को अपनाना चाहिए, लेकिन अपने मूल्यों और संस्कृति को कभी नहीं भूलना चाहिए।
डॉ. चमनलाल सचदेवा केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं — सेवा, सादगी, और शिक्षा की। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा दीप है जो अंधकार में भी राह दिखाता है।
उनके अनुभव, विचार, कार्य और व्यवहार ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर इरादा नेक हो, तो उम्र और सीमाएँ कोई बाधा नहीं बनतीं। वे आज भी पूरी ऊर्जा से समाज के लिए समर्पित हैं, और यही समर्पण उन्हें सच्चे अर्थों में “राष्ट्र निर्माता” बनाता है।
इस लेख के माध्यम से हम समाज को यह बताना चाहते हैं कि डॉ. चमनलाल सचदेवा जैसे व्यक्तित्व विरले होते हैं। हमें न केवल उनका सम्मान करना चाहिए, बल्कि उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और देश के निर्माण में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
लोक नायक संवाद
















